Readings

रिश्तों में प्यार कम, और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान ज्यादा

पुराने दिन भले थे, जब रिश्तेदारों के मिलने पर दिल की गर्माहट महसूस होती थी। जब लोग एक-दूसरे का हाल पूछते थे, तो वह...

भाभी – इस्मत चुग़ताई

 भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से पंद्रह बरस की होगी। बढवार भी तो पूरी नहीं हुई थी। भैया की सूरत से ऐसी...

जडें – इस्मत चुग़ताई

 सबके चेहरे उड़े हुए थे। घर में खाना तक न पका था। आज छठा दिन था। बच्चे स्कूल छोड़े, घर में बैठे, अपनी और...

चौथी का जोडा – इस्मत चुग़ताई

 सहदरी के चौके पर आज फिर साफ - सुथरी जाजम बिछी थी। टूटी - फूटी खपरैल की झिर्रियों में से धूप के आडे -...

नयी कहानी का प्लॉट – अज्ञेय

रात के ग्यारह बजे हैं; लेकिन दफ़्तर बन्द नहीं हुआ है। दो-तीन चरमराती हुई लंगड़ी मेजों पर सिर झुकाये, बायें हाथ से अपनी तक़दीर...

सभ्यता का एक दिन – अज्ञेय

 नरेन्द्र जीवन के झमेलों से बेफ़िक्र रहता था। लापरवाही उसका सिद्धान्त था। राह-चलते जो मिल गया, ले लिया और चलते बने। सुख मिला, हँस...

संस्कृति और परिस्थिति – अज्ञेय

यदि आप आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रगति से तनिक-सा भी परिचय रखते हैं, तब आपने अनेकों बार पढ़ा या सुना होगा कि हिंदी आश्चर्यजनक...

सिकंदर हार गया – अमृतलाल नागर

 अपने जमाने से जीवनलाल का अनोखा संबंध था। जमाना उनका दोस्‍त और दुश्‍मन एक साथ था। उनका बड़े से बड़ा निंदक एक जगह पर...

गर्मियों के दिन – कमलेश्वर

 चुंगी-दफ्तर खूब रँगा-चुँगा है । उसके फाटक पर इंद्रधनुषी आकार के बोर्ड लगे हुए हैं । सैयदअली पेंटर ने बड़े सधे हाथ से उन...

आत्मा की आवाज़ – कमलेश्वर

मैं अपना काम खत्म करके वापस घर आ गया था। घर में कोई परदा करने वाला तो नहीं था, पर बड़ी झिझक लग रही...

दिल्ली में एक मौत – कमलेश्वर

मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम...

तक़सीम – गुलज़ार

जिन्दगी कभी-कभी जख्मी चीते की तरह छलाँग लगाती दौड़ती है, और जगह जगह अपने पंजों के निशान छोड़ती जाती है। जरा इन निशानों को...

Haal Ki Kuch Baatein ..!

रायना की वजह से ज़रूरी और खास बना ये खट्टा-मीठा साल

इस साल की शुरुआत ही कुछ अजीब ढंग से हुई थी। 2024 के 30 दिसंबर को, मेरे मामा की तबीयत अचानक खराब हो गई...

ब्लैकआउट के बाद की सुबह

कभी-कभी ज़िंदगी में अजीब हादसे होते हैं। जो सोचा नहीं था, अक्सर वही हो जाता है।अभी परसों आधी रात की बात है। नींद में...

एक ऐसा हैंगओवर, जिसकी तलाश सालों से थी

किसी भी बड़े आयोजन के बाद जो एक मीठा-सा खालीपन बचता है, वही असली आफ्टर पार्टी इफ़ेक्ट होता है। वो थकान नहीं होती, बल्कि...

हर फैसला पैसों से नहीं लिया जाता – कुछ फैसले समझाए नहीं जाते

अक्सर ज़िंदगी एक जैसी नहीं रहती। कभी सब कुछ संतुलन में होता है, तो कभी अचानक हालात बदलने लगते हैं। और तब सबसे ज़्यादा...

जो तूफ़ान हमसे गुज़रा, उसे कौन समझे?

ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ हमें कुछ ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जिनकी पीठ पर भारी बोझ होता है। देखने...

थोड़ा थका हूँ… टूटा नहीं हूँ: ज़िन्दगी से दो-चार होते कुछ साल और एक नई शुरुआत की उम्मीद

कभी-कभी ज़िन्दगी में ऐसा वक़्त आता है जब इंसान खुद को पहचान नहीं पाता. एक वक़्त था जब सब कुछ बिल्कुल ठीक था. 2018...

रायना की दूसरी फ्लाइट – डर, सीख और एक यादगार सफ़र

हमारी फ्लाइट थी — दिल्ली से वापस पटना की।हमने सोचा था कि जैसे पटना से दिल्ली आते समय रायना ने बिल्कुल भी परेशान नहीं...

जब रायना और अव्यय पहली बार मिले — दो मासूमों की पहली मुलाकात

इस ब्लॉग को शुरू किए हुए दस साल से ज़्यादा हो चुके हैं. हाँ, पिछले कुछ सालों से ये ब्लॉग नियमित नहीं रहा, लेकिन...